मंडाण
राजस्थानी कविता संचयन / संपादक- नीरज दइया
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चैन सिंह शेखावत री कवितावां
चंदो
(1.)
चंदो
मेड़ी ऊपराकै
उचक
'
र
ताळ रै मांय
झाँक्यो
,
पण बैरी हा
धोळा धोरा
आय बिचाळै
चानणी-चून्दड़ी
खोस लीनी
,
ओढ़
'
र
पसरग्या।
***
(2.)
चंदो
जाणै बोरलो
रजनी बाँध
बीनणी बणगी
टणमण टणमण
करता तारा
मोत्यां सिरखा
ढुळ्या ओढणी
ओढी सोवण
नार निराळी।
***
संतोष मायामोहन री कवितावां
सिमरण
खाली है थांरा
अदीतवार सूं लेय
’
र
सनिवार तांई रा सातूं खानां
कै वार रै एक-एक खानै
मांदौ थे कूं-कूं पगलिया
अथम अनै-
निसर जावो
थांरी आगै री जातरा माथै ।
म्हारो धन, थारै उदय-अस्त रो
सिमरण ।
***
करमानसा
म्हूं नहावणी
चावूं हूं
करमनासा नदी मांय
धोवणी चावूं
म्हारा सगळा ई-
पाप
अनै पुन्न
बणनी चावूं मानवी
दरसण करणा चावूं
म्हारै मांयलै मिनखपणै रा ।
***
शिवराज छंगाणी री कवितावां
जय गणतंत्तर
जय गण तंत्तर
जय जन तंत्तर
हरियळ चूनर
ओढियोड़ी तन
मुळक रैयो है
माटी रो मन ॥
फेरे जादू मंत्तर ।
बलिदानां रा बीज
बोयोड़ा खेत में ।
आजादी री पौध
फळै है रेत में ।
लेवै सांस सुतत्तर ॥
फूलां री सौरम
मैके है बाग में ।
सूरज-चांद उजासै
तन अनुराग में ।
दूर हटियो परतंत्तर ।
भेद भाव रौ भरम
मिटै है हेत में ।
त्याग-तपस्या फळै
करम रै खेत में ॥
देवै जीवण मंत्तर
जय गण तंत्तर
जय जन तंत्तर
***
रामेश्वरदयाल श्रीमाली री कवितावां
आदमी :
छापो
आज रो आदमी
भारी भरकम
रफ-प्रिंट पर छप्यो
ताजो छापो है
वो सैं क्यूं बतावै
सगळी दुनिया री खबरा
ब्योरैसर
साफ-साफ
बड़ै चितरामां समेत
कीं साच
अर घणी अतकळां
पण खुद रै बारै में
कीं कोनी कैवै
कदे ई नीं कैवै !
***
मालचंद तिवाड़ी री कवितावां
छेकड़लै दिन आ दुनिया
कविता हुवैला-
छे
’
लो रूंख ।
प्रीत रा मरुथळां
निपजैला कोरी प्रीत ।
चिड़कल्यां लेवैला फेरूं बासो
रूंख री रेसमी छियां ।
पेलै दिन रै ढाळै
छेकड़लै दिन आ दुनिया-
पाछी थारी-म्हारी हुवैला-
***
आकास
थूं कठै आकास
उडार में,
कै पांख में ?
मुगत हां म्हे
कै हां, थारी कांख में ?
बितरो ई तो नीं थूं,
जितरो समावै,
म्हांरी आंख में ?
***
भगवती लाल व्यास री कवितावां
आग
केसूला रो एक फूल
रेत पे फैंक नै
लोग नाल रिया है वाट
कै मौसम
अब बदळै, अब बदळै
अर वे एक फूल रै
रंग सूं खेल सकै फाग ।
जरूरतां रा
घेर-घुमेर झाड़क्या में
फंसगी है
जिनगाणी री चिरकली
रुई ज्यूं पीनणी आग्या
पांखड़ा
होठां पे अण थाग झाग
गावै है दरद भरियो गीत
जिणरौ अरथ है-
कठै वे आंबा अर
कठै वे बाग ?
रात ठण्डी अर मांदी
म्हूं सुलगावणों चावूं हूं
चिमनी
बरसां सूं कसेर रियो हूं
अघबळिया छाणां
उचींद रियो हूं राख
पण जाणै कठै गमगी है
आग ?
***
गोरधनसिंह शेखावत री कवितावां
आदमी
कांकड़ रै माथै
आवता-जावता लोगां नै
निरखण आळो
छग्योड़ो बंवळियो
***
प्रेम
रेगिस्तान रै मांय
जद-कद होवती बिरखा
***
संबंध
दीया रै मांय घाल्योड़ो
थोड़ो उधारो तेल
***
सभ्यता
बिना धणि री
भेळियोड़ी खेती
***
सांझ
नाज रा टोटा में
बुझ्योड़ा चूलासी
***
(
राजस्थानी-1
सूं)
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