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रमेश भोजक ‘समीर’ री कवितावां

म्हनैं ठाह है
(एक)
म्हनैं ठाह है
उतांवळो है दुसासन
आपवाळां रो
चीर-हरण खातर
अर
आपां
हाथ माथै हाथ धरियां
बैठ्यां हां
एक-दूजै सूं दूर
दूर दूर दूर
कोसां रै आंतरै माथै
फ़गत उडीकां हां-
किसन नै !
***

(
दोय)
म्हनैं ठाह है
नाप जोख‘र
हैसियत मुजब
बणाया जावै
अजकाळै भायला !

एक-दूजै री कमर में
खाज करणै रै समझोतै सागै
गूंथीजै रिस्ता

इणी’ज खातर तो
अजकळै टाळ दिया जावै
कङखै बिना नखवाळा नै ।
***

(तीन)
म्हनैं ठाह है
भीङ हुवै-
गूंगी
बोळी
अर बावळी !

सावळ
कोनी बोलै
कोनी सुणै
अर
समझै ई कोनी !
***
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