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शांति भारद्वाज ‘राकेश’ री कवितावां

गीतिका
सूंळो काम करां तो
अतनो काम करां ।

क्यूं बस्ती की विपदा
देखां बैठा घरां ।

रावन की छाती पै
अंगद-पांव धरां ।

झा।द पसीनो मुळका
आंसू देख झरां ।

कुण थारो, कुण म्हारो
चारूं मेर फिरां

बंध्या-बंध्या पग सोग्या
चौगान्यां पसरां

बंसत छा, पुरखां रो
ऊंचो नांव करां ।
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