भंवरलाल ‘भ्रमर’ री कवितावां

दस हाइकू
(1)
सुख-सांपत
मिरग तिरसणा
जण-जण री
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(2)
सदां ई हुवै
चावळ-दाळ भेळा
जुदा-कोकळा
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(3)
नीं पड़ै आभो
आपरी ऊंची टांगां
सांभै, टींटोड़ी
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(4)
सबद-काया
कलम री कोख सूं
झरतो इमीं
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(5)
सांमै अंधारो
सूरज मांगै वोट
भोर खातर
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(6)
काळी बादळी
आकास-बरगद
बूंदां रो आळो
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(7)
जिकां नै चाया
जी सूं बेसी, बां ईज
बताया भूंडा
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(8)
गावै बधावो
आयां, भोर-भायली
चिड़ी-कागला
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(9)
सूरज-धरा
रमै लुकमीचणी
बादळी आयां
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(10)
पड़गी भींतां
ईसकै री लाय में
भायां बिचाळै
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शारदा कृष्ण री कवितावां

बाळू रेत
थांरो म्हारो न्यारो हेत
थूं मरधर मैं बाळू रेत

सूरजी रो तप, चांद उजाळौ
बादळ बूंद, नदी सूं नाळओ
एक बिना दूजो नीं सिरजै
लोप देख अंतस रो काळो

समदर सूं सीप्यां मत सेंत
थूं मरधर मैं बाळू रेत

सांस एक पण बीजी काया
जीव ब्रह्म सूं अळगी माया
भंवरां फूलां रै सगपण सूं
सौरभ रा अनुबंध सवाया

तोल मती हिवड़ै रो हेत
थूं मरधर मैं बाळू रेत

अकथ जातरा इण थळवत री
कुण जाणै पीड़ा पिणघट री
रीता घट नैणां जळ निठ्यो
नाद हुई गूंगी अणहद री

धोरां धोरां पसरियो हेत
थूं मरधर मैं बाळू रेत
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अम्बिका दत्त री कवितावां

ठूंठ अर चूंच
धिक्कार छै ई कठफोड़ी जूण नै
सारी उमर
ठक-ठक करतां ही खड जावे
पण
तोल ई न्ह पडे
आवाज ठूंठ में सूं आ रही छै
क चूंच म सूं ।
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सीसाड़ो
आपन
कदी मीठा तेल को दियो बळती बेरां,
बाती की चरड़-चरड़ सुणी छै ?
बस ।
उतनो सो ही छै
जीवता रहबा को सीसाड़ो
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म्हां तौ नं पढां
आप न ! कदी
रेल गाड़ी मं बेठ्यां
पाछे भागता रूंखड़ा देख्या छै ?
जणे-गांव ।
स्कूल सूं बस्तो ले
भागतो जा रह्यो होवै
अर माथो हला हला
कह रह्यो होवे
म्हां तौ नं पढा ।
म्हां तौ नं पढा ।।
म्हां तौ नं पढा ।।
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कुमार गणेश री कवितावां

बणजा बेटा मोरयो
प्रीत पगल्या टूट्या-फूट्या,घाल गले में डोरयो
रोवनो है तो बिरखा में रो,बणजा बेटा मोरयो 

इब बे बेली मिलै कठे है,इब बे जूनी बात्यां है
काढ कालजो चाखै साथी,इब कांई  ओ होरयो   

नूंवे जमाने री निजरां सूं,इत्तो फरक तो आ ई ग्यो 
पेली बाजतो जीको 'चोरसा',इब बो ई है 'चोरयो'

लोई सूखग्यो चेरे रो,आंख्यां भाटा बणगी है 
जद सूं टूट्यो था रै म्हारे,मन बीचे रो डोरयो

पाछो इब तूं कांई आसी,कांई था री उम्मीदां राखां
बाथां भर ले आज 'कुमार',देख कोई है रो रयो 
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इयां कियां पार पड़ेली 
दो पग आगा,दस पग पाछा,इयां कियां पार पड़ेली
दस है कूड़ा,दो है साचाइयां कियां पार पड़ेली

कपडछाण  जे करो सांच रो,हाथ कंई नई आवेला 
मुंडा माथा,कूड़ा साथाइयां कियां पार पड़ेली

जोर जमायो कुरसी तांई,दौड़ लगायी कुरसी तांई 
करयां ऊंधा साटा-बाटा,इयां कियां पार पड़ेली

मिनाखाचारो रूंख लटकियो,यारी पड़गी कूवे मांई   
कूवे भांग घुली है यारां,इयां कियां पार पड़ेली

आंगणिया खाली-खाली है,गली-गवाडां स्यापो पड़ग्यो 
बरणाटा मारे सरणाटा,इयां कियां पार पड़ेली

चमक उतरगी धोरां री,सै धोला धट्ट होयग्या है 
गाँव आंवता सैरां मांई,इयां कियां पार पड़ेली
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