शांति भारद्वाज ‘राकेश’ री कवितावां

गीतिका
सूंळो काम करां तो
अतनो काम करां ।

क्यूं बस्ती की विपदा
देखां बैठा घरां ।

रावन की छाती पै
अंगद-पांव धरां ।

झा।द पसीनो मुळका
आंसू देख झरां ।

कुण थारो, कुण म्हारो
चारूं मेर फिरां

बंध्या-बंध्या पग सोग्या
चौगान्यां पसरां

बंसत छा, पुरखां रो
ऊंचो नांव करां ।
***

लक्ष्मीनारायण रंगा री कवितावां

रात
दिन री
पोथी पर
चढ़ियो
काळो कवर
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जनता री आवाज
चौखट कसियै
काच लारै
भिणभिणावती
छटपटावती
माखी
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साच
अमावस
रो
चांद
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भौ
संचानणै
डर जाऊं
खुद री
छिंया सूं
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संस्कृति
बिसरा रैयी
हथेळ्यां
मैंदी रो
रचाव
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पतियारो
नीं रैयो
पतियारो
डावी आंख नै
जीवणी पर
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आतंक
खुद रा हाथ भी
डरै
आपस में मिलता
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राष्ट्रीय पर्व
कलैण्डर
छपियोड़ा
लाला चौखाना
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चेतना
राख-धुंवै
घिरी
चिणगारी
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पर्यावरण रा दूहा
प्रदूशण नै रोकणो, सै सूं पैलो काम।
जे काबू ओ नीं हुयो, बचा नीं सके राम।।

रंग-बिरंगो जैरतो, रच रैयो पोलीथीन।
फैषन, सुविधा कारणै, जीवण मौत अधीन ।।

नई है सुद्ध खावणो, नीं है निरमल नीर।
आभै में विस घुल रयो, हवा जैर रा तीर।।

दिवलो एक बाट रो, जल सी आखी रात।
दियो जी चार बाट रो, बुझती आधी रात।।

इण धरा री सुदंरता, रंग-रूप-रस पाण।
जे प्रकशित मिटती गई, जगती हुसी मसाण।।

धरती सै री मात है, आभो है जी तात।
मा- जाया सा बिरछ है, मत कर इण सूं घात।

धुंआ पी-पी धुंआ हुया, तन धुंएं री लकीर ।
तन-मन धन धुंआ लगा, हुयग्यो फकीर ।।

घायल धरा टसक रयी, हुयो गगन बीमार,
सागर रो दम धुट रयो, नदियां हाहाकार

सिवजी दाई जैर पी, इमरत बाँटे रूख।
कामधेनु अे कलपतरू, मत काटो थे रूख।।

जांभा जी सूं सीख लो, खेजडली री आण।
हरा रूंख जे काट सो, हुय सी देस मसाण।।

धरती मा रो दूध पी, बधै ए हरिया रूंख।
मा-जाया नै बाढ थे, बालो मा री कूख।।

इकीसवीं मे रैवणिया, सुणो सदी रो ग्यान।
आज लगाओं बन हरा, भविय मिलै बरदान।।

गगन-पवन, जल अर धरा, बणिया जैरी दंस।
मिनख जमीं जलमा रया, धश्तराश्ट्री बंस।।

जठै-जठै आदम गयो, मैल बिखरी जाण।
गंग, हिमालो, चांद ई, मैला मिनखा पाण।।

नीं मेला, ना मगरिया, नई तीज-त्योहार।
सावण नीं, फागण नई, किंया करै सिणगार।।

भोर कुंकमिया नई, केसरिया नीं सांझ।
मोती सा दिनडा कठै, नीं चांदणिया रात

मनुज देपावत री कवितावां

रे धोरां आळा देस जाग
धोरां आळा देस जाग रे, ऊंठां आळा देस जाग।
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे, धोरां आळा देस जाग।।
धोरां आळा देस जाग रे........
उठ खोल उनींदी आंखड़ल्यां, नैणां री मीठी नींद तोड़
रे रात नहीं अब दिन ऊग्यो, सपनां रो कू़डो मोह छोड़
थारी आंख्यां में नाच रह्या, जंजाळ सुहाणी रातां रा
तूं कोट बणावै उण जूनोड़ै, जुग री बोदी बातां रा
रे बीत गयो सो गयो बीत, तूं उणरी कू़डी आस त्याग।
छाती पर पैणा..............
खागां रै लाग्यो आज काट, खूंटी पर टंगिया धनुष-तीर
रे लोग मरै भूखां मरता, फोगां में रुळता फिरै वीर
रे उठो किसानां-मजदूरां, थे ऊंठां कसल्यो आज जीण
ईं नफाखोर अन्याय नै, करद्यो कोडी रो तीन-तीन
फण किचर काळियै सापां रो, आज मिटा दे जहर-झाग।
छाती पर पैणा..............
रे देख मिनख मुरझाय रह्यो, मरणै सूं मुसकल है जीणो
ऐ खड़ी हवेल्यां हँसै आज, पण झूंपड़ल्यां रो दुख दूणो
ऐ धनआळा थारी काया रा, भक्षक बणता जावै है
रे जाग खेत रा रखवाळा, आ बाड़ खेत नै खावै है
ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यां, उण महलां रै लगा आग।
छाती पर पैणा..............
ऐ इन्कलाब रा अंगारा, सिलगावै दिल री दुखी हाय
पण छांटां छिड़कां नहीं बुझैली, डूंगर लागी आज लाय
अब दिन आवैला एक इस्यो, धोरां री धरती धूजैला
ऐ सदां पत्थरां रा सेवक, वै आज मिनख नै पूजैला
ईं सदां सुरंगै मुरधर रा, सूतोडां जाग्या आज भाग।
छाती पर पैणा..............
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