श्याम गोइन्का री कवितावां


तिरस म्हारली है बैसाख
थांरै कनै चमन री दाख
म्हारै कनै प्रीत री साख
थां रो जोबन मदभरियो
म्हारी कुचमादी है आंख
थे हो शीतळ सरवरियो
है म्हारै हंसां री पांख
थे हो झिरमिर सावणियो
तिरस म्हारली है बैसाख
श्याम सूं नीं प्रीत करी जे
पाळ्यो-पोख्यो जोबन खाक.
***

बिंधग्या सो मोती
मांय सूं उघाड़ाफ़ीच्यां पै धोती
भू जायी पोती पण बिंधग्या सो मोती
अधमरिया दोघड़उछाळ करै मोकळी
बोबाडै जितणी जोउतणी बा थोथी
समंचार मरिया रा आगूंच त्यार है
जावै जे कूकतीजावै जे रोती
करम अर धरम मांय मन री परधानता
मन ही तो गंगा हैमन ही गंगोती.
कुओ अठीबठी नै खाई
सेवा करी जै बरसां तांई
भांग रै भाड़ै जासी कांई ?
मौत लिलाड़ी लिखार ल्याया
कुओ अठीबठी नै खाई
मूंड मुंडाता ओळा पड़ग्या
निरभागी के कर लै लाई
मजबूरी में हुया मोडिया
प्रीत प्रभु में कोन्या आई
धन-धणियापो मैल हाथ रो
आछी कीरत श्याम कमाई.
***

मधुकर गौड़ री कवितावां

तद बैरण रात ढळै कोनी
अब आंख्यां नींद पळै कोनी
मनङै री जोत जळै कोनी

आंख्यां रो समदर सूक गयो
अब नैणां नीर ढळै कोनी

मन में यादां री उठै हूक
अब सुपना सांच फळै कोनी

आंख्यां पे जद पौहरा लागै
आंख्यां री दाळ गळै कोनी

जद आंख्यां नींद उचट जावै
तद बैरण रात ढळै कोनी

आंख्यां नै आंख्यां जद भूलै
पीङा री पीङ गळै कोनी
***

बिन ममता रो किसङो जीवण
मायङ री आंख्यां मिळ ज्यावै
आसूं रा फुलङा खिल ज्यावै

बिन ममता रो किसङो जीवण
सपना रो मोती छुळ ज्यावै

मां री आंख्यां री अगनी नै
देखै तो धरती हिल ज्यावै

जद मायङ री आंख पसीजै
घावां रा मूंढा सिल ज्यावै

आंख्यां री ममता पाकर तो
जीवण नै जीवण मिल ज्यावै
***

कविता किरण री कवितावां

(1)
छोरयाँ
छोरयाँ
कांई ठा क्यूं
डार जावै है
काळी रातां में
अपणी ई छाया सूं
अर काछबा ज्यूं
समेट लै
सिकोड लै अपणे अंगा नै
अपणी
खाळ रै मांय।
पकड-पकड छोडे
एक-एक स्वास
ऊलाळा में ई
थर-थर धूजै
पी जावै


मूंडे री भाप।
छोरयाँ
डरप जावै
सूना गेलां में
पगरख्यां री
चर-चर स्यूं।
जम जावै
बरफ ज्याण
अपणै ईज डीळ रै
सांचा में।
हो जावै भाटा ज्यूं
मिनखां री
डील नै आर-पार भेदती
निजरां रै पडतां ईं
छोरयाँ
कांई ठा क्यूं
नमती जावै दन-दन
लदियोडी
डाळी ज्यूं
गड जावै
धरती रै मांय
नीं कीधे
अपराध रै बोध स्यूं।
छोरयाँ
अबै घणी थाकगी है
खुद अपणी ई
बधती उमर रै
बोझ स्यूं
***  

(2)
कूण कैवे है
रीता समदर में
जायर तिरां
भरया घडा में ई
पाणी भरां
कीं करणो
कीं नीं करणो
ओ ई ठा कोनी
स्म्रितियां रे
जंगळ में
रोता फिरां
अर
अपणी ई
छाया सूं डरां।
कूण कैवे


समै रे साथै
सगळा घाव
भर जावे।
बसंत रै
आतां ई
सूखा पाना
सैंग झर जावै।
कूण कैवे है ?
कूण ?
***

हरीश भादाणी री कवितावां

बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो

एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थें
विंयां घड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो?
***

[पोथी जिण हाथां आ रेत रचीजै सूं साभार]

कानदान "कल्पित" री कवितावां

मुरधर म्हारो देश
मखमल बेळू रेतरमै नित राम जठै ।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

सोनै जैडी़  रेत मसळता हाथां में
राजी हूता नांख दो मुट्ठी माथां में
रमता कान्ह गुवाळ बण्योडा़ खेतां में
जीवण रा चित्राम मंड़योडा़ रेतां में
मुळकै मूक सजीव,.पड़या सैनाण जठै ।
मुरधर म्हारो देश,झोरडो़ गांव जठै ॥

नामी नगर नागौर नगीणा न्यारा है
भारत-भर में एक चमकता तारा है
जोधाणै नर तेज जियां तलवारां है
बीकाणा सिर मौड़ फ़णी फ़ुंफ़कारां है
जौहर जैसलमेर ज़बर झुंझार जठै ।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

जंगी गढ़ चितौड़ धाक रणधीरां री
जगत सिरोमणी धामपदमणी मीरां री
अमर,अज़र,अज़मेर हाकमी पीरां री
जैपर गुलाबी सैर हार लड़ हीरां री
जंतर-मंतर म्हैल,माळिया और कठै।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

ऊंचो गढ़ गिगनार आबू हज़ारां में
लागै भीड़ अपार धूम बज़ारां में
कोटा,बूंदी चमक चांदणी तारां में
मस्त नज़ारा देख,चंबल री धारां में
पग-पग पर घनघोर,घुरया घमसाण जठै।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

खेत,करम,नितनेम,धरम री पोथी है
साथी है हळ,बैल,पसुधन गोती है
फ़टी-पुराणी पागऊंची-सी धोती है
कामगरा,किरसाणजागती जोती है
जीवै मैणत पाण,मानवी देख जठै।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

जीवण रो आधार,एक ही खेती है
बिरखा म्हारै देस सदा कम होती है
बरसै सावण मास अणंद कर देती है
बाज़र,मोठ,गुंवार,मूंग-कण मोती है
काचर,बोर,मतीर,मेवा मिस्टाण जठै ।
मुरधर म्हारो देश,झोरडो़ गांव जठै ॥

करै कोयला डील,तपै ज्यूं धाणी है
पच-पच करदै रगत,पसीनो पाणी है
जीवत बाळै खाल,मूंढै मुळकाणी है
खड़यो तावडै़ लाय,धुंवां धकरॊळ उठै।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

लंबा काळा केस लूंबा लट्ट नागणियां
धीमी चाल मराल जियां गज़गामणियां
पतळी कमरां होठ गुलाबी-सी कळियां
मीठा मिसरी बोल,कंवळ-तन कामणियां
पणघट पग पणिहार,पायल री झणकार उठै ।
मुरधर म्हारो देश,झोरडो़ गांव जठै ॥

काम पड़यां हर नार,झांसी राणी है
मरज़ादा कुळ लाज,अमर निसाणी है
घुरतां घोर निसाण हुया अगवाणी है
नर सिमरथ मजबूत पगां में पाणी है
हंसता-हंसता सीस , सौंप दै बात सटै ।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥

माणस मूंघा जाण जिता जळ ऊंडा है
भिडि़या दै नीं पूठ ,पैंड पाऊंडा है
जीव थकां लै खोस कुणां रा मूंडा है
छेड़यां काळै नाग सरीखा भूंडा है
रण में बबरी सेर ,सरीसा भभक उठै ।
मुरधर म्हारो देश,झोरडो़ गांव जठै ॥
मखमल बेळू रेत,रमै नित राम जठै ।
मुरधर म्हारो देशझोरडो़ गांव जठै ॥
***

सीखड़ली
डब-डब भरिया, बाईसा रा नैण ,
चिड़कली रा नैण,लाडलड़ी रा नैण,
तीतरपंखी रा नैण,सूवटड़ी रा नैण,
दोरो घणो सासरियो ॥

मायड़ जाण कळेजै री कोर,फ़ूल माथै पांख्यां धरी ।
माथै कर-कर पलकां री छांय,पाळ-पोस मोटी करी॥
राखी नैणां री पुतळी जाण,मोतीड़ा सूं महंगी करी ।
कर-कर आघ,लडाई घण लाड,
भरीजी मन गाढ,
जीवण मीठो ज़हर पियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

डूबी सोच समंदड़ै रै बीच,तरंगा में उळझ परी।
जाणै मोत्यां बिचली लाल,पल्लै बंधी खुल परी ।
भरियो नैणां ममता-नीर,लाडलड़ी नै गोद भरी ।
जागी-जागी कळैजै री पीड़,
हिय सूं लीवी भीड़ ,
गरळ-गळ हिवड़ो भरियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

भाभीसा काढ काजळियै री रेख,संवारी हिंगळू मांगड़ली ।
बीरोसा लाया सदा सुरंगो बेस,ओढाई बोरंग चूंदड़ली ।
बाबोसा फ़ेरियो माथै पर हाथ,दिराई बाई नै सीखड़ली ।
ऊभो-ऊभो साथणियां रो साथ,
आंसूड़ा भीज्यो गात ,
नैणां झड़ ओसरियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

करती कळझळ हिवड़ै रा दो टूक,कूंकूं पगल्या आगै धरिया ।
कायर हिरणी-सी मुड़-मुड़ देख ,आंख्यां माथै हाथ धरिया ।
मुखड़ो मुरझायो बिछडंतां आज ,रो-रो नैण राता करिया ।
चांद-मुखड़ै उदासी री रेख ,
डुसक्यां भरती देख,
सहेल्यां गायो मोरियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

रथड़ै चढती पाछल फ़ोर,सहेल्यां नै झालो दियो ।
कूंकूं-छाई बाजर हरियै खेत,जाणै जियां झोलो बियो |
छळक्या नैण घूंघटियै री ओट,काळजो काढ लियो ।
काळी-काळी काजळियै री रेख,
मगसी पड़गी देख,
नैणां सूं ढळक्यो काजळियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

मनण-रूठण रा आणंद उछाव,हियै रै परदै मंडता गिया ।
सारा बाळपणै रा चित्राम,नैणां आगै ढळता गिया ।
बिलखी मावड़ नै मुड़ती देख, विकल नैण झरता गिया ।
करती निस-दिन हंस-किलोळ,
बाबोसा-घर री पोळ,
ढ्ल्या रो रमणो छूट गियो,
दोरो घणो सासरियो ॥

लागी बालपणै री प्रीत,जातोडी जीवड़ो दोरो कियो ।
रेसम रासां नै दी फ़णकार,सागड़ी नै रथड़ो खड़यो ।
धरती अम्बर रेखा रै बीच,सोवन सूरज डूब गियो ।
दीख्या-दीख्या सासरियै रा रूंख,
रेतड़ली रा टूंक,
सौ कोसां रहग्यो पीवरियो ,
दोरो घणो सासरियो ॥

डब-डब भरिया, बाईसा रा नैण ,
चिड़कली रा नैण,लाडलड़ी रा नैण,
तीतरपंखी रा नैण,कोयलड़ी  रा नैण ,
सूवटड़ी रा नैण,दोरो घणो सासरियो ॥
***

मुरधर रा मोती
(परमवीर चक्र मेजर शैतानसिंह खातर)
फ़र्ज़ चुकायो थे समाज रो ,
मुरधर रा मोती ,मारग लियो थे रीति रिवाज़ रो ।

बोली माता हरखाती , बेटो म्हारो जद जाणी,
लाखां लाशा रे ऊपर सोवेला जद हिन्दवानी।
बोटी बोटी कट जावै ,उतरे नहि कुल रो पाणी।
अम्मर पीढयां सोढानी पिता री अमर कहानी ।
ध्यान कर लीजे इण बात रो , मुरधर रा मोती दूध लाजे ना पियो मात रो।

सूते पर वार न कीजो ,धोखे सूँ मार न लीजो ।
साम्ही छाती भिड़ लीजो,गोला री परवा नाहीं।
बोली चाम्पावत  राणी, पीढयां अम्मर धर कीजो।
फ़र्ज़ चुकायो भारत मात रो , मुरधर रा मोती , सूरज सोने रो उग्यो सांतरो ।

राणी री बात सुणी जद , रगत उतरयो नैना  में ।
लोही री नई तरंगा ,लाली छाई अंग अंग में ।
माता ने याद करी जद ,नाम अम्मर मरणा में।
आशीसा देवे जननी , सीस धरियो चरणा में।
ऊग्यो अगवानी जुध्ध बरात रो , मुरधर रा मोती , आछो लायो रे रंग जात रो।

धम धम उतरी महलां सूँ ,राणी निछरावल करती ।
बालू धोरां री धरती, मुळकी उमंगा भरती ।
आभो झुकियो गढ़ कांगरा,डैना ढींकी रण झरती।
पोयां पग धरता बारै , पगल्याँ बिलूम्बी धरती।
मान बधाज्यो बिन रात रो , मुरधर रा मोती, देसां हित मरियां जस जात रो ।

चुशूल पर चाय करण  री, चीनी जद बात करेला ।
मर्दां ने मरणों एकर झूठो इतिहास पड़ेला।
प्राणा रो मोल घटे जद ,भारत रो सीस झुकेला।
हूवेला बात मरण री, बंस रो अंस मरेला।
हेलो सुणज्यो थे गिरिराज रो, मुरधर रा मोती, देसां हित मरियां जस जात रो ।

तोपें टेंके जुधवाली,धधक उठी धूवाली।
गोळी पर बरसे गोळी,लोही सूँ खेले होली।
कांठल आयां  ज्यूं काली ,आभे छाई अंधियाली ।
बोल्यो बरणाटो गोलो , रुकगी सूरज उगियाली ।
फीको पडियो रे रंग प्रभात रो, मुरधर रा मोती, देसां हित मरियां जस जात रो ।

जमियो रहियो सीमा पर छाती पर गोला सहकर ,
चीनीडा काँपे थर थर ,मरगा चीन्चाडा कर कर ।
सूतो हिन्दवानी सूरज , लाखां लाशा रे ऊपर ।
माता की लाज बचाकर , सीमा पर सीस चढ़ाकर ।

मुकुट राख्यो थे भारत मात रो, मुरधर रा मोती ,फ़र्ज़ चुकायो थे समाज रो।
मुरधर रा मोती, देसां हित मरियां जस जात रो ।
***

हब्बीडो़
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।
निरेताळ री झाटक राटक , उठ्ठण दे हब्बीडो़ रे,
                                                       बेली धीरो रे ।
खटक बसोलो रटक बजावै,हळ थाटै खातीडो़ रे ।
पीळै बादळ खेत पूगियो, हळ ले कर हाळीडो़ रे ।
भातो ले भतवारयां हाली,ले बळद्यां रै नीरो रे ।
                                                      बेली धीरो रे ।
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।

फ़ाटी-सी धोती अंगरखी,हूगी लीरो-लीरो रे ।
रगत पसीनो धरती सींचै,ओ लाडेसर कीं रो रे ।
जीवत खाल तावडै़ बाळै,ओ कुण मस्त फ़कीरो रे ।
                                                       बेली धीरो रे ।
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।

पेट पड़यो पातळियो खाली ,भूखो हळियो बावै है ।
भूख-तिरस नै मार तपस्वी,पच-पच खेत कमावै है ।
उतर खालडी़ बांठां लागै ,जद आवै कातीरो रे ।
                                                      बेली धीरो रे ।
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।

हिमत राखज्यै मत घबराई,दुख घणेरा आवैला ।
अलख जगा खेतां में बेली, हीरा  बिणज कमावैला ।
आवैला मैणत कर बाळद,लाख-लाख रो हीरो रे
                                                       बेली धीरो रे ।
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।

मुरधर री धोरा धरती रो,मीठो-गुटक मतीरो रे ।
टीबै माथै बैठ साथीडा़,कनक-काकडी़ चीरो रे ।
खटमीठा काचर रसभीणा ,स्वाद अनोखो बीं रो रे ।
बेली धीरो रे ।
झटक झाड़बड़ रटक सूड़ पर,बाजण दै भच्चीडो़ रे ,
                                                       बेली धीरो रे ।
निरेताळ री झाटक राटक , उठ्ठण दे हब्बीडो़ रे,
                                                       बेली धीरो रे ।

(आभार : श्री ओम पुरोहित कागद व श्री नारायण सिंह देवल)
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