रावत सारस्वत री कवितावां

कुण समझाग्यो
कुण समझाग्यो मनैं ओ मरम
कै राजनीत रा अजगरां सूं लेय
दफ्तरां रा कमटाळू घूसखाऊ बाबुआं तकात
सगळां रा कांसां बाटकां में नित परूसीजै
रिकसो खींचतै म्हारै बूढ़ै बाप री
थाकल फींचां रो खून-पसानो
कमठाणै भाठा फोड़ती
कै तगारी ले तिमंजलै चढ़ती-उतरती
म्हारी हेजल भा रा हांचळां रो सूखतो दूध
अर नानड़ियै नैं बोबै री ठोड गूंठो चुंघाती
म्हारी बैन रा झरता आंसू अर कसकतो काळजो।

कुण समझाग्यो मनैं
गरीबी हटाओ रा भासणां रो
तर-तर खुलतो ओ भेद
ज्यूं झालर बाजतां अर संख फूंकीजता पाण
आपै ही उठता पग ठाकुरद्वारै कानी
अर साध पूरण रा सुपनां में
डोलरहींडै चढ़तो-उतरतो मुरझायो मन,
त्यूं ही तीस-तीस बरसां तक
आये पांचवैं साल
खोखां में घालता गया सुपनां रा पुरजिया
अर उडीकता गया अंधारै में आखड़ता
उण झीणै परगास री गुमसुदा किरण।
ओजूं घूमड़ै है बादळा आज
ओजूं कळै है अमूझो
कीड़्यां रै पांखां ओजूं निकळण लागगी है
व्यापगो है रिंधरोही में भींभरियां रो भरणाट
उड़ता बधाऊड़ा देवण लाग्या है कसूण
पण मंडाण मंगळ मेघ रा नीं है भायां
सत्यानासी है अकाळ री आ बरखा
धान री ढिगलियां ढाती
छान-झूंपड़ा उजाड़ती
थोथा भरमां में पाळती
एकर फेर पंच-बरसी नींद ज्यूं औसरसी।
इन्दर रै घर राणी बण बैठी
आ महामाया
ओजूं फूंकसी थारा कानां में
'गरीबी हटाओरो गुपत ग्यान
अर थे समझता हुयां भी
फेर बण जाओला अणजाण
फेर दूध रै भोळै
पी जावोला घोळ्योड़ो चून
क्यूंकै गरीबी में रैणो थारी नियति है।
***

काळ
कुण कैवै काळ पड़ग्यो!
कठै है काळ
तिसाई धरती रै ताळवै चिप्योड़ा
बळबळती बाळू सूं भूंज्योड़ा
फूस री टापर्यां अर झूंपां रा
उजड़्योड़ा गांवां अर ढाणियां रा
निरभागिया जीव
क्यूं जलम लियो इण खोड़ में!

कायर हा, बुजदिल हा, बेवकूफ हा
आं रा पुरखा
जिका इण निरभागी धरती में,
लुकर प्राण बचाया!
लूंठा हा, वीर हा, सायर हा वै
जिका माळ री धरती नैं दाबी राखी
अर देसनिकाळो दियो बां नाजोगां नैं

तनतोड़ मैनत कर भी
जिका दो जूण टुकड़ा नीं तोड़ पाया
गधां री ज्यूं लद-लद भी
जिका टेम पर दाणां री जगां लातां खाई
बांरै खातर धरती रा सुख कोनी सिरज्योड़ा
भाग री भ्रगु-संहिता में
बांरी कुंडळी नैं जगां कोनी!

अंजन रा कूआ, ऐ दाखां रा बाग
गरणाटा टैक्टर, ऐ कोसां लग खेत
छळछळती नहरां, ऐ कमतरिया चाकर
फारम, ऐ जीपां, आ दारू, आ चोधर
सुख रा साधन बांरा कियां हो सकै!
बीजळी सूं गरमायोड़ा
बीजळी सूं ठण्डायोड़ा
बीजळी सूं चमकायोड़ा
बीजळी ज्यूं पळपळाता
आलीसान बंगला!
बांरा कियां हो सकै!

कुन्नण ज्यूं दमकती, चन्नण ज्यूं महकती
नागकुंडाळा सा केसां रा जूड़ा सजावती
चोलीदार ब्लाउजां में
गोरै चीकणै डील रा पळका मारती
टेरालीन में सरसर करती
सरसराती कारां नैं दौड़ाती
नाजुकड़ी हिरणाखियां
बांरी कियां हो सकै!

धरती रो ओ सुरग बांरो है
जिका भुजबळ रा धणी है
जिका गज रो काळजो अर
मिनख रो मगज राखै
जिकां में हौंसलो है संघर्सा सूं जूझणै रो
अर सामरथ है घिरतै बखत सूं
बांथां भर लड़णै री........
***

चांद : आज अर काल
जुगां-जुगां तक किसन कन्हैया
बाल हठीला, ठिणक-ठिणक कर
रया मांगता चांद खिलूणो।
पण बापड़ी जसोदावां के करती
भर-भर जळ रा ठांव, दिखा कर
झूठ-मूठ रा चांद, भुळाती, लाल मनाती।

पण अब धन-धन भाग धरण रा
काल, जसोदावां जुग री घर हरख मनासी
गोदी में ले किसन लाडला
चांदड़लै रै देस रमासी
सुपनां री परियां नैं सांप्रत-
गिगन-झरोखै बैठ बुलासी, नाच नचासी।

जुगां-जुगां रा भरम टूटसी
आंधा बिसवासां गढ़ भिळसी
चरखा और डोकर्यां गुड़सी
सींगाळा मिरधा भी रुळसी
मामो चांद दिसावर जासी
अब टाबरिया क्यूं बिलामासी!

भेद प्रकटसा अब सदियां रा
पोथां और पुराणां रा सै
उपमा और कल्पनावां सै कूड़ी होसी
चांद लोक रा गढ़-गढ़ लिख्या गपोड़ा
अब तो चौड़ै आसी।

धरती रा जायां रो धूंसो
बण बादळ री गाज घमकसी
चांदड़लै में मिनख जात री धजा फरकसी
देवो-देव-परी सब लुळ-लुळ मुजरा करसी।
***

सुरसत नैं अरज
किण नै बिड़दाऊ ए सुरसत किण रो जस गा
किण नैं म्हारोड़ा गीतां जुग-जुग पूजवाऊं, अमर बणाऊं

वाणी तूं दीन्ही ए मायड़, किरपा तूं कीन्ही
वाणी रै मोत्यां किण री माळ पुवाऊं, हार सजाऊं

धरती लचकावै कुण वो, आभै नैं तोलै
सातूं समदां री लहरां जिण री जय बोलै
इसड़ो नरसिंह बतादे जिण रो जस गाऊं, जिण नैं बिड़दाऊं

लिछमण सी झाळां जिण री हणवंत सी फाळां
रघुवर सा बाणां जिण रै परळै री ज्वाळा, चण्डी विकराळा
इसड़ी रामायण वाळो राम मिलादे ए मायड़ जिण नैं पुजवाऊं

जिण रा होठां पर सुर रा समद हिलोळै
जिण रा बैणां में गीता ज्ञान झिकोळै
इसड़ो सुद र सण वाळो स्याम दिखादे ए जामण जिण रो जस गाऊं

बलमीकी नावूं मैं तो, द्वैपायन ध्याऊ, तुळसी मनाऊ, सुर रो सूर बुलाऊं
जिण री लीला रा सौ-सौ छन्द रचाऊं
किण नैं बिड़दाऊं ऐ सुरसत किण रो जस गाऊं
***

श्यामसुंदर भारती री कवितावां

खेजड़ी
पगां री ब्यावां नीं
घणी तिरसी नै
साव सूख नै तिड़ाई नाड़ी री गळाई
आखौ डील फाटोड़ौ

लोही रा आंसुवां री गळाई
खाक मांय कर बैबतौ
पिघळियौड़ै गूंद रौ रेलौ

छाती माथलै
चिनियेक ठींडै मांय सूं
मकोड़ा आवै-जावै
खाली पेट रौ परमाण
वा थोथ

बरसां सूं
रिन रोही मांय
एक टांग माथै ऊभी एकली तपै
तपसण खेजड़ी

अर अठा रौ मिनख
खेजड़ी री जूण जीवै ।
***

दुष्यन्त जोशी री कवितावां

सुख
दु:खी है
सुख चा'वै ?
तद सुख ना बटोर

दु:ख बांट
दूजां रां

सुख
आपो आप आ सी
सिर रै ताण ।
***

परम्परा
जुवानपणै में
मा अर बापू
टाबरां  सूं
बात नीं करै

तद टाबर
आपरै  जुवानपणै में
मा-बापू सूं
बात नीं करै

इण में
आपां
टाबरां नै
नीं कै' सकां
कसूरवार

क्यूं  कै
टाबर तो
आपरी
परम्परा निभावै ।
***

भींत
आपां सगळा
'इगो' सारू लड़ां
अर एक दूजै रै बिचाळै
खींचद्यां भींत
जकी
बधै रातोरात
मैं'गाई ज्यूं
पछै
भळै 'इगो' टकरावै
तद
भींत
कीं और बध ज्यावै।
***

तरक्की
सै'र सूं
गांव कानी
म्हूं  घणकरी बार
पगांईं चाल पड़ू

इण सोच रै साथै
कै
घणांईं साधन है
चढा लेसी कोई

पण सगळा
मेरै कन्नै सूं
टपता जावै
आप-आपरा साधन ले'

कोई नीं रोकै
कोई नीं कै'वै
अरै आ भई
बैठ
म्हारै होंवतां
पगां क्यूं बगै?

स्यात
गांव तरक्की करै

मन्नै लागै
गांव
सै'र बणण लागग्यौ।
***

मिनख
गळ्यां टेडी-मेडी
अर कित्ती संकड़ी है
चालणौ भौत दोरौ है
इणां माथै

पण
बै' भी मिनख है
जिका
खुद बणावै
पगडंडी

बै' जठै खड़्या हुवै
लेण बठै सूं  सरू हुवै

बा'नै लखदाद है
बा'नै घणा-घणा रंग
जिका जीतै
बार-बार जंग।
***

उदासी
आज
रूंख भी
उदास-उदास है
चाँद भी
उदास है
चिड़कल्यां भी
उदास है
पून भी
उदास-उदास सी बगै

म्हूं   भी
आज उदास हूँ
तद प्रकीरती भी
उदास है।
***

जतन
घणौ जीण सारू
लोग कित्ता करै जतन

नीं जाणै
कै
जग
दरयाव है
दु:खां रौ

सगळा
कठै जाणै तिरणौ।
***

आंसू
भीतर सूं  भरज्यै
काळजौ
अर दु:ख-सुख में
हुज्यै पोळमपोळ
तद
आंसू रै मिस आ ज्यै
आंख्यां सूं  बारै।
***

बटाऊ
आजकालै
बटाऊ सारू
कागला कुण उडावै

बटाऊ
जे मजबूरी में आवै
तो आंवतांईं
चल्यौ जावै।
***

कागद
कागद आणा
बंद हुग्या
कागद जाणा
बंद हुग्या
अबै कुण राख सी
कागदां नै
संभाळ'

कागद
अबै म्यूजियम री
चीज बणग्या

अबै लागै
कागद अडीक सी
मिनख नै।
***

अचंभौ
अचंभाळी बात सुण'र भी
अचंभौ नीं करै

म्हूं  देख्या
आंख्यांळा आंधा
अर जीभ हुवतां थकां मून
मिनख नै

मिनख
क्यूं  नीं देखै
अर
किंयां रै'वै मून
इत्ती भीड़ में।
***

दिवळौ
दिवळै री लौ
कम नीं हुवै
अंधारौ पाटण सारू

दिवळै री देह
अर ताकत नै
अंधारौ जाणै
आपां नीं।
***

रूंख
रूंख
उदास-उदास
खड़्यौ है आज

आपरी उदासी मुजब
रूंख बतावै

कै मिनख
म्हारी ठंडी छिंयां में
थ्यावस सारू
क्यूं  नीं आवै?
***
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