यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ री कवितावां

म्हांरा लिखारा
चारण रो चारण
मती बण म्हांरा लिखारा ।
इण सूं तू थांरी ओळखाण
धूड़ में मिल जावैली ।
आपरी निजू पिछाण
कोयलै सूं मांडयोड़ै
भींतां माथै आखरां ज्यूं
चन्नी सीक छड़कां सूं
मिट जावैली
थांरै हियै मांय
खार खायोड़ौ मिनख
मुड़दो होय जावैला
तू तू नीं रै जावैलो
एक भाटो होय जावैलो
सुण / तू थारै मांयलै मिनख नैं
टंटोळ / सागीड़ौ पंपोळ ।
थांरौ बळतो मिनख औरूं बळै ।
तूं खरो-खरो लिखै /
सांची-सांची कैवै
लिखारा !
म्हैं तन्नै संची कैवूं
चारण रो चारण मती बण ।
***

1 टिप्पणी:

  1. बहुत बढ़िया...
    कवि धूमिल के शब्दों में " अधजले शब्दों के ढेर में आत्मीयता तलाश करती कविता....

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