मोहन आलोक

पाली भासा रो अविनासी ग्रंथ
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नीरज दइया 





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कृति- धम्मपद (बुद्ध)  भावानुवाद कवि- मोहन आलोक
संस्करण- 2005 ; मूल्य- 100 रुपये
प्रकाशक- रणजीत प्रकाशन, महामैत्री विहार, ग्राम-शिवपुरी,
पोस्ट श्री विजयनगर-335704 (श्रीगंगानगर) राजस्थान
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सगळा धरम मन्न उत्पन्न है, कह, अर करै सुच्छ मन कार।
सुख लारै चाल पड़ै, ज्यूं छायां चालै माणस लार।।
भगवाब बुद्ध मन-वाणी अर करम रै सीगै मिनख नै सुद्ध बणावण रो काम करणोचायो। आज बुद्ध जयंती। भगवान तथागत बुद्ध रै सिमरण रो दिन। आपाणी सगळीभासावां रै एक वंस-बिरछ। उण में संस्कृत पछै पाली रो नांव। साहित्य अरलेखन-कला री दीठ सूं पाली भासा महतावूं। बुद्धवाणी रो सांवठो ग्रंथ- 'त्रिपिटक'। इणरा तीन भाग- विनयपिटिक, सुत्तपिटिक अर अभिधम्मपिटिक। आं तीनूं में अनेकग्रंथां रो समावेस। सुत्तपिटिक रै अनेक ग्रंथां में एक- 'धम्मपद'। पाली भासा नै जिकीरचनावां महान बणावै उण में धम्मपद रचना सिरै। कैयो जावै कै एसिया खंड मांय जेकणांई किणी अविनासी ग्रन्थ री रचना हुई है तो वो है धम्मपद...!!! पण भासा बासजीव, जिकी बोलीजै-सुणीजै अर लिखीजै। पाली भासा आज इतिहास री जिनसबणगी। आपरै जूनै साहित्य रै कारण पाली याद करीजती रैवैला। पाली नै राजस्थानीमें अनुवाद करण सूं बेसी अबखो काम उण नै आज रै जुग सापेख बणावणो है।आपणी भासा राजस्थानी में धम्मपद रो भावानुवाद छप्यो है। जे कोई महाकवि किणीमहान रचना रै अनुवाद रो जिम्मो लेवै तो सोनै में सुगंध जै़डो काम हुवै। राजस्थानीरा कवि मोहन आलोक ओ जिम्मो उठायो। बरस 2005 में धम्मपद रो राजस्थानीअनुवाद छप्यो। किणी पण छंद रो अनुवाद अबखो काम। मोहन आलोक छंद सिद्धकवि है। बां राजस्थानी में आपरी खिमता दरसाई। डांखळा, ग-गीत, चित मारो दुखनै, सौ सोनेट, आप (रूबाइयां), एकर फेरूं राजियै नै, वन देवी अमृता, चिड़ी री बोलीलिखो जै़डा मैलिक काव्य ग्रंथ रा रचणहार मोहनजी राजस्थानी रा आलोक। आधुनिकराजस्थानी रै उजास में एक लूंठो नांव। आप जफऱनामा अर उमर खयाम री रूबाइयांरा अनुवाद पण कर्या है।
धम्मपद रै अनुवाद मांय सरलता, सरसता अर छंद री सादगी में अरथ री रवानगी देखतां बणै। पद्मश्री डा. श्यामसिंह शशि रो मानणो है- '.. आलोक रो अनुवाद मूळ रै नैड़ै  हुंवता थकां ई कोरो अनुवाद नईं लागै।' मान्यो जावै कै अनुवाद री खिमता अनुसिरजण सूं ई सांवठी नै सवाई हुवै। इण ओळी रो खरैखरी अरथ तो अनुवाद रो काम पोळायां ई समझ में आवैला। इण रो राजस्थानी अनुवाद साहित्य-समाज में घणै-घणै मान-सम्मान नै गीरबै री बात है। बौद्ध अध्ययन विभाग, नई दिल्ली रा विद्वान डा। भिक्षु सत्यपाल मुजब- 'मूळ पाली गाथा अर राजस्थानी भासा मांय करियोड़ै अनुवाद में पालि अनै राजस्थानी री नजदीकता रो बोध ई हुवै।' मूळ 'धम्मपद' रै सुखवर्ग री आं ओळ्यां सागै उण रो अनुवाद देखण सूं परखत प्रमाण मिलैला कै साहित्यिक खिमता सूं ई ओ संभव हुयो है।
'जिघच्छापरमा रोगा, सड़्खरा परमा दुक्खा।
एतं ञत्वा यथभूत, निब्बार्ण परमं सुखं।।
'स्सै सूं मोटो रोग भूख है, संस्कार मोटो दुख जाण।
इणनै जिण जाण्यो उण खातर, सबसूं मोटो सुख निरवाण।।'
'धम्मपद' 26 वर्गां में जिणां नै आपा सर्गां में बंट्योड़ो मान सकां। जिण में कुल 423 छंद है। 'धम्मपद' इण खातर महान ग्रंथ कै आज रै आपा-धापी रै जुग में किणी नै कोई मारग अठै लाध सकै। अध्यात्म-दर्शन-उपदेस-सीख अर मरम री ओळ्यां रो एक खजानो है धम्मपद। ओ बो ग्रंथ है जिण सूं हजारूं-लाखूं नीं, अणगिणती रा मिनख-लुगाई इण असार संसार में सार सोधण री जुगत साधी। ग्यान तो चारूंमेर है। जरूरत है खोजी री। कबीर रै सबदां में खोजी होय तो तुरत मिलै है पल भर की तलास में...। धम्मपद में लिख्यो है-
'साधु पुरस रा दरसण आछा, साध संगती आछी बात।
नीच पुरुस नईं सपनै दीखै, तो नर सुखी रेवै दिन-रात।।206।।
मूरख री संगति नईं आछी, उण री संगति शत्रु समान।
धीरवान नर री संगति है, निज रै ही निज मित्र समान।।207।।
 

बुद्ध जयंती माथै ख़ास आलेख रै रूप में प्रकाशित "दैनिक भास्कर" ( आपणी भाषा-आपणी बात : 9/5/2009)


मोहन आलोक री कवितावां बांचो

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