भागीरथ सिंह भाग्य री कवितावां

दूहा
लोग न जाणै कायदा ना जाणै अपणेस ।
राम भलाईँ मौत दे मत दीजै प्रदेश ||

ना सुख चाहु सुरग रो नरक आवसी दाय।
म्हारी माटी गांव री गळियाँ जै रळ जाय॥

जोगी आयो गांव सूँ ल्यायो ओ समचार ।
काळ पड्यो नी धुक सक्यो दिवलाँ रो त्युहार् ॥

इकतारो अर गीतडा जोगी री जागीर ।
घिरता फिरतापावणा घर घर थारो सीर ॥

आ जोगी बंतल कराँ पूछा मन री बात ।
उगता हुसी गांव मँ अब भी दिन अर रात ॥

जमती हुसी मैफलाँ मद छकिया भोपाळ ।
देता हुसी आपजी अब पी कै गाळ ॥

दारू पीवै आपजी टूट्यो पड्यो गिलास ।
पी कै बोलै फारसी पड्या न एक किलास ॥

साँझ ढल्याँ नित गाँव री भर ज्याती चौपाळ ।
चिलमा धूँवा चालती बाताँ आळ पताळ ॥

पाती लेज्या डाकिया जा मरवण रै देश ।
प्रीत बिना जिणो किसो कैजे ओ सन्देश ॥

काळी कोसा आंतरै परदेशी री प्रीत ।
पूग सकै तो पूग तूँ नेह बिजोगी गीत ॥

मरवण गावै पीपली तेजो गावै लोग ।
मै बैठयो परदेश मँ भोगू रोग बिजोग ।।

सावण आयो सायनी खेता नाचै मोर ।
म्हारै नैणा रात दिन गळ गळ जावै मोर ॥
***

एक छोरी काळती
एक छोरी काळती हमेशा जीव बाळती,
सींवा जोड़ खेत म्हारो चाव सूँ रूखाळती |(एक छोरी...

ऊंचा ऊंचा टीबडा मै रूंखड़ा रो खेत हो ,
खेत रुजगार म्हारो खेत सूँ ही हेत हो |
हेत हरियाल्या नै तावडा सूँ टाळती || (एक छोरी ...

बेल बीरो शीश फूल फूल बीरी राखड़ी,
एक बार आखडी तो बार बार आखडी |
लाज सूँ झुकी झुकी सी लूगड़ी संभाळती|| (एक छोरी ...

भोत राजी रेवती तो झूपडी बुहारती ,
रूसती तो गाव्ड्या नै बाछड़ा नै मारती |
हेत जै जणावती तो टींडसी उछाळती || (एक छोरी ...

गाँव रै गुवाड़ बीच देखती ना बोलती ,
हेत सूँ बुलावता तो आँख भी ना खोलती |
खेत मै ना जावता तो गाळीयाँ निकालती ||(एक छोरी ....

***



क़सर नहीं है स्याणै में
सुख को कनको उड़तो कीया काण राख दी काणै में
खोयो ऊँट घडै मै ढूडै कसर नहीं है स्याणै में
भूल चूक सब लेणी देणी ठग विद्या व्यापार करयो
एक काठ की हांडी पर ही दळियो सौ बर त्यार करयो
बस पङता तो एक न छोड्यो च्यारू मेर सिवाणै मै
खोयो ऊँट घडै में ढूँढे कसर नहीं है स्याणै मै


डाकण बेटा दे या ले , आ भी बात बताणी के
तेल बड़ा सू पैली पीज्या बां की कथा कहाणी के
भोळा पंडित के ले ले भागोत बांच कर थाणै मे
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में

जका चालता बेटा बांटै ,बै नितकी प्रसिद्ध रैया
बिगड़ी तो बस चेली बिगड़ी संत सिद्ध का सिद्ध रैया
नै भी सिद्ध रैया तो कुण सो कटगो नाक ठिकाणै मे
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में

बडै चाव सूँ नाम निकाल्यो , होगो घर हाळा भागी
लगा नाम कै बट्टो खुद कै लखणा बणरयो निर भागी
तूं उखडन सूँ नहीं आपक्यो थकग्यो गाँव जमाणै में
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में 

***

फस्गो देश लफंगा मै
आ रै साथी जतन करां फस्गो देश लफंगा मै ।
काळै मुह का धोळ पोशिया हाथ घिचौळै गंगा मै ॥

कोई रथ मै लांघ बान्ध रह्यो कोई लांघ खींच रह्यो है ।
कोई टोपी टेढी करकै दिन भर जाड भींच रह्यो है ॥
कोई चक्कर कै चक्कर मै देश धकेलै दंगा मै .. .....
आ रै साथी जतन करां

कह कै नट ज्या बढ कै हट ज्या आ का सांग अणुता है ।
मंगता बणकै बोट मांग सी जीत्या पाछै जूता है ॥
जैपर को न्यूतो दे ज्यावै खुद लादै दरभंगा मै ... .....
आ रै साथी जतन करां

जा मै दिन मै माता बोलै बांका मुजरा रातां मै ।
जा बहणा का चरण पखारै रात भाण बै बांथा मै ॥
अब देखो लूंड मरै लिपटै लाश तिरंगा मै ... .....
आ रै साथी जतन करां

जनता सामी बाजीगर बणकै के के खेल दिखा रह्या है ।
जन विकास की लिया बान्दरी करज विदेशी खा रह्या है ।
गरज, हेकडी, नकटाई, बेशर्मी, आ भिखमंगा मै ........
आ रै साथी जतन करां

बुद्धिप्रकाश पारीक री कवितावां

गजल
सब का दोष बखाण भायला !
पण खुदनै मत जाण भायला !

जाण की नींद उडार चैन सैं
सो जा खूंटी ताण भायला !

पलकां मीच पळक लै मछळ्यां,
मत चूकै चौहान ! भायला !

किरकांट्या-सी रंग बिरंगी
छिब कुण सकै पिछाण भायला !

रावण ज्यूं हंस-हंस डकार जा,
रिसवत रूपी बाण भायला !

हरि को भजन पेट को धंधो,
कर समाज कल्याण भायला !

चकरासी जितरी चिमकासी,
या दुनियां छै साण भायला !

लोही तो आण छाण्यो पी जा,
पण पाणी ता-छाण भायला !

चमचा चमच्यां सैं रचवा लै
बुद्धिप्रकाश-पुराण भायला !
***

तेजसिंह जोधा री कवितावां

पीणो सांप
चेतो
चेतोके थांरी छाती माथै
कुंडाळो घालर नासां सहारै
फण साध्यां
बैठो है पीणो सांप
पीवै, भासा, भरोसो अर सांस

पोछड़ी
जद ओ
पूछ रो फटकारो देयर जावैला
तद थांनै देस अर
आजादी रो अरथ समझ में आवैला

हतभाग ! कै मोड़ो व्है जावैला
मोड़ो व्है जावैला !
***

चोथी आळी बांचणियां नै
कीं तो खायग्यो राज
कीं लिहाज
अर रह्यो-सह्यो खायगी चूंधर खाज
-चौथी ओळी बांचणियै नै
जचै ज्यूं मांडो आज ।
***
Text selection Lock by Hindi Blog Tips