जितेन्द्र कुमार सोनी 'प्रयास' री कवितावां

मिनख-लुगाई
मिनख
बाद में बणै है
बाप,
भाई,
घरधणी
अर बेटो,
पैलां हुवै है
सदां मिनख।
अर लुगाई
सदां हुवै
मां,
बैन,
जोड़ायत
अर बेटी,
पण आखी जूण
कदै नीं बण सकै
फगत एक लुगाई।
***

फुटपाथ पर बैठ्यै बाप रा सुपना
सड़क बिचाळै
फुटपाथ पर बैठ्यै
बाप रा सुपना
होग्या ईंट रा,
सिमटगी सोच
एक कमरै मांय।
एक कमरो बण्यां पाछै
नीं दिखै
कमरै रै बा' स्यूं
फाट्योड़ा गाबां मांय
लगोलग जुवान होंवती
बीं री तीन छोरियां,
नीं दिखैला
बै सारा
पाणी स्यूं
पेट नै स्हारो देंवता।
छात अर भींतां
छुपा सकै
बां रा कई दुख,
बातां
कदै नीं जाणै
महलां मांय रैवण वाळा।
च्यार दीवारां अर
छात री कीमत
जाणै है
आसमान री छात तळै
फगत एक
बूढो बाप।
***

टाबर
बाळपणैं में
सोय जांवतो मां री खोळां
खेलण नै बाफर ही
फगत एक खटोलड़ी।
पीसां रो अरथ हो फगत
फाँक संतरै वाळी।
नान्हो-सो हो डील
फगत इतरो कै
ल्हुक ज्यांवतो
माटली लारै।

हरेक सिंझ्यां लावती
म्हारै सारू
धूड़ रो फूल
जिणनै निरख-निरख
बजांवतो ताळी
रेवड़ री टाली
गाय-बछडिय़ां रै मेळ रो
निराळो सुर
भांवतो हो म्हानै
भांवती ही बा उडती खंख
जिणरी सौरम
म्हारै मन में बसी है
अजे तक।

बाळपणो मनभावणो म्हारो
जिणमें कदे लड़्या,
कदे मिल्या,
मुळक्या,
खिल्या।
कदे ही नीं चिणी म्हे भींत
मन रै आंगणियां,
नीं जाणी तेर-मेर
जाणता हा
आखै बास री रोट्यां रो सुवाद।

आज नीं ल्हुक सकूं
म्हारै कूड़ै बड़प्पण सूं
सोचूं-
आछो होवै है टाबर होवणो
पण कित्तो दोरो है आज
टाबर होवणो ?
***

कींकर
मांगीड़ै रै खेत
अर नै'र बिचाळै री
कींकर नीं जाणै
ग्लोबल वार्मिंग
आतंकवाद
अर राजनीति रा खेल।
नीं पिछाणै
ओबामा
सोनिया
मुशर्रफ।
कींकर जाणै
फगत आ बात
कै जद भरयोड़ी चालै नै'
तो पूगज्यै
मांगीड़ै री घरवाळी
खेत मांय।
अर टाबर हुळसता तोड़ै
पातड़ी।
जद घटज्यै नै'र रो पाणी
तो टळकै मांगीड़ै री आंख
अर सूखती नै'र रै सागै
खेत होज्यै उजाड़
बच ज्याऊं म्हैं अ'कलो
उडीकतो
नै'र रो पाणी!
***

मिनखपणो
सलीम !
अब क्यूं नीं मांगै
थारी रुखसाना
भींत उपराकर
म्हारै घरां
तीज-तिंवार
रंधियोड़ी खीर !
क्यूं नीं मन करै
मांग ल्ये
म्हारो रामू
थारी ईद री सिवइयां !
अब क्यूं नीं करै
रामू अर रुखसाना री मां
भींत रै दोन्यूं कानी
ऊभी हुय'
घरबिद री बातां !
क्यूं म्हारै घर री आरती
अर थारै घर री नमाज
घोळै कानां मांय सीसो !
अब कद कूद'र जावैला
खेलण सारू
रामू अर रुखसाना
अक -दूजै रे घरां !
क्यूं कटग्या सलीम
अब आपां इता
अक - दूजै सूं !
बता सलीम बता ,
आपणै घरां बिचली भींत
मोटी अर ऊँची हुगी
का सलीम अर स्याम रो
मिनखपणो छोटो ?
***

सत्यनारायण सोनी री कवितावां

॥ एकलड़ी ॥
 तू ही म्हारो काळजो, तू ही म्हारो जीव।
 घड़ी पलक नहिं आवड़ै, तुझ बिन म्हारा पीव!

 जब से तुम परदेस गए, गया हमारा चैन।
 'कनबतिया' कब मन भरे, तरसण लागे नैन।।

 चैटिंग-चैटिंग तुम करो, वैटिंग-वैटिंग हम्म।
 चौका-चूल्हा-रार में, गई उमरिया गम्म।।

 सुणो सयाणा सायबा, 'गी करवा चौथ।
 एकलड़ी रै डील नै, खा'गी करवा चौथ।।

 दीवाळी सूकी गई, गया हमारा नूर।
 रोशन किसका घर हुआ, दिया हमारा दूर।।

 दिप-दिप कर दीवो चस्यो, चस्यो म्हारो मन्न।
 पिव म्हारो परदेस बस्यो, रस्यो म्हारो तन्न।।

 रामरमी नै मिल रया, बांथम-बांथां लोग।
 थारा-म्हारा साजनां, कद होसी संजोग।।

 म्हैं तो काठी धापगी, मार-मार मिसकाल।
 चुप्पी कीकर धारली, सासूजी रा लाल!

 जैपरियै में जा बस्यो, म्हारो प्यारो नाथ।
 सोखी कोनी काटणी, सीयाळै री रात।।

 म्हारो प्यारो सायबो, कोमळ-कूंपळ-फूल।
 एकलड़ी रै डील में, घणी गडोवै सूळ।।

 दिन तो दुख में गूजरै, आथण घणो ऊचाट।
 एकलड़ी रै डील नै, खावण लागै खाट।।

 पैली चिपटै गाल पर, पछै कुचरणी कान।
 माछरियो मनभावणो, म्हारो राखै मान।।

 माछर रै इण मान नैं, मानूं कीकर मान।
 एकलड़ी रै कान में, तानां री है तान।।

 थप-थप मांडूं आंगळी, थेपड़ियां में थाप।
 तन में तेजी काम री, मन में थारी छाप।।

 आज उमंग में आंगणो, नाचै नौ-नौ ताळ।
 प्रीतम आयो पावणो, सुख बरसैलो साळ।।
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