विनोद स्वामी री कविता


विनोद स्वामी
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आओ, म्हारो घर दिखाऊं
 
आओ,
म्हारो घर दिखाऊं
जिकै नै फोड़’र अब दूसर बणांऊं
क्यूं कै
अब इण रो जाबक जबाब है।
हरेक कड़ी रै नीचै
लगायोड़ै टग सूं लागै-
ओ भीसम री भांत अेक जोधो है
जिको कोई परण सूं बंध्यो
आपरा पिराण कोनी छोड सकै।
फेर ई मायत री भांत
म्हारी चिंता करै
म्हारो सिर पळूंसै।
लारली दियाळी नै ओ
लालड़ी माटी अर गोबर रै गारै सूं
इस्यो सींगरयो
जाणै कोई
कोडायलो बराती हुवै
अबकै चौमासै पछै
इण री गत इसी होगी
जाणै सै’र री बरात में
कोई सीधो-सो देहाती होवै।
लिप्योड़ो तो ओ
जाणै मा नैं
मुळक’र कैवै हो-
तू दुनिया री सैं सूं तकड़ी दरजी है।
पण
घर गेरती बरियां
म्हारी गत
बीमारी में दुख पांवतै मायत नै
गीता रो अध्याय सुणावण-सी ही।
सैं सूं पैली कस्सी
मंडेरी री ईंट पर पड़ी
जिकी फूटती-फूटती
आंगण री मुट्ठी में
बेल रो एक बीज देगी।
इणरै साथै ई
म्हारी निजरां सामी
कई चौमासा अर झड़ी
मंडेरी माथै
बेल बण पसरग्या।
पण
अचाणचक म्हैं देख्यो कै
दूर बैठी दादी री आंख्यां सूं
एक आंसू निसर्यो है।
म्हनै लाग्यो-
ईं घर री विदाई सारू गायोड़ो
सैं सूं तकड़ो मौन-गीत है।
म्हे राजी-राजी-सा
अणमणा-उदास-सा
घर सूं मकान तक री जातरा में
भोत दुख पाया।
साच्याणी म्हे
ईं नैं फोड़नो कोनी चावै हा।
पण कांईं करां,
भींता
नीचै-नीचै सूं
पैली कळी
फेर गारो माटी
अर फेर 
पुस्ती तकात सूं नटगी।
रातूं
कडि़यां रा कटका निसरता
अर टाबर डरता।
डोरा-डांडां सूं
भूतणी तो कांईं ठाह भाज ई ज्यावै
पण
एक-एक कड़ी री
दो-दो धोबा दीमक किंयां मरै?
कटका जादा निसरै बिंया ईं
म्हारी धीरज री हद पर
धरम अर देवां पर भरोसै रा फूल
हिराळ मारण लाग ज्यावै
नेड़ै-तेडै़ री तो बात ई कांईं करां
दूर-दराज रै देवां री
सवामणी तकात कबूलीज्यै।
घरां
बखारी सूनी अर
आखां रा ठाठिया भरग्या
पण
घर री पार पड़ती कोनी दीसै ही।
ईं घर रै फूटण रो फेर
इतणो दुख क्यूं हो?
ईं रो सैं सूं मोटो कारण
ओ है कै-
म्हारै घर री मंडेरी अर भींत
जिकै रद्दै में मिलै
साळ में बो
फगत अेक रद्दो कोनी
जूनी नगरी है,
ईं री आपरी
एक सभ्यता अर इतिहास है।
ईं रद्दै में
चिडि़यां रा आलणां अर
तरेड़ां में छिपकलियां रा ईंडा है।
म्हारै सागै रैवतां
आं जिनावरां कदी
म्हानै कोई दुख कोनी दियो।
पण म्हे फगत
म्हारै घर नै
नूंवो बणावण सारू
आं रै घरां री
अणदेखी पर उतर आया हां।
म्हारै सामी पड़ी
एक छिपकली री कटेड़ी पूंछ
म्हानै
बकार-बकार कैवै ही कै-
आ बात आछी कोनी।
आळां रै एक जूनै जाळै में
डंड पेलती एक दूक्कड़ी
म्हानै चेतावणी-सी द्यै ही कै-
म्हारै घर रै हाथ लगा दियो तो
ठीक नहीं रैसी।
जद तक
छात अधेड़ी
एक चीड़ै अर चीड़ी
म्हारै असवाड़ै-पसवाड़ै बैठ
बेरो कोनी
म्हानै कितणी गाळां काढी।
भंवरा माटी में बड़ती
एक भीरड़ बरड़ाई,
कूंवाड़ रै कोचरै बड़तो
काळियो भूंड भड़क्यो,
सरदळ री ओट में
टांटियां रो छत्तो तणतणायो,
तरेड़ां में कसारियां
मूंछां फरकाई,
ऊंदरां बिलां सूं नाड़ काढ
ओळमो दियो।
जीव-जिनावरां में मची
इण खळबळी सूं लागै हो कै
म्हैं एक प्यारी-सी दुनियां में
इसी दखल दी है
जिकी सूं भोत खून-खच्चर होसी
अर
जिनावरां रो इतिहास
म्हानै मिनख नहीं
आपरो सैं सूं मोटो दुसमण कैसी।
छात पछै आळा-दियाळा
घर री बरसां पुराणी
एक-एक चीज
कस्सी री चोट सूं
मरती बगै ही।
अचाणचक
भींत सूं पड़्यै एक लेवड़ै
जाणै-
म्हारी यादां री
पुराणी बही रा पाना-सा खोल दिया।
कई पड़तां रै इण लेवड़ै में म्हानै
गाम रै खंदां सूं
तपती दुपारी में
लालड़ी माटी ल्यांवता
लुगायां रा झूलरा दीख्या।
जादा माटी चकण सूं
चणक पड़ेड़ी चमेलकी,
मजरोड़ पडे़ड़ी मीरकी दीसी।
दादी रो करेड़ो धोळक,
बुआ रो लगायोड़ो गारो,
गारै खातर मांग्योड़ो गोबर,
गोबर सूं नट्योड़ी पड़ौसण,
ईं बात सूं रूस्योड़ी मा,
मा सूं बात लेंवती सा’मली ताई,
ताई री चुगली सूं होयोड़ी राड़,
अर
राड़ में बेमतलब कूटीज्योड़ो म्हैं
लेवडै़ कानी देखतो रहग्यो।
घर दूसर बणायां पछै
म्हारो घर
घर कम
अर
एक मकान जादा होग्यो
घर अर मकान में
कांईं फरक होवै?
म्हैं कोनी जाणूं
पण
घर सूं गम्योड़ो
राखूंडो,
माटी में गुद्दी मिला’र
बणायोड़ो हारो,
बाखळ
कोरी रेत
म्हानै कठै सूं ई हेला मारै
जाणै घर
मकान रै नीचै दब्योड़ो कर्रावै।
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1 टिप्पणी:

  1. सच में ही बहूत मार्मिक कविता है जी

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