संजय आचार्य ‘वरुण’ री कवितावां

मुट्ठी भर उजियाळो
निजरां सूं कीं कीं कैवणौ
मूंडै सूं कीं
कैवण सूं बत्तो हुवै
असरदार
म्हैं सीखग्यौ.
म्हैं जाणग्यौ
के रात रै अन्धारै में
न्हायोङी धरती
जे चन्दरमा सूं मांग लेवै
मुट्ठी भर उजियाळौ
तो चन्दरमा
मूंडो फ़ेरर खिसक जावै
अर घणी बार
बो ई चन्दरमा
दिन थकै आय धमकै
धरती री छाती पर
अणमांवतौ
उजियाळौ लेर.
***

सतरंगी काया
राती हुयोङी आंख्या
पीळौ हुलक मूंडौ
काळासी गमायोङा
धोळा केस
चामङी रै मांय सूं
झाकौ घालती
हरी टांच नाड्यां
आंख्या नीचै फ़ेल्योङौ
बैंगणी अमूजौ
अर डोळां रै
आसै-पासै तिरता
गुलाबी डोरा
ऐङै-गेङै लैरावंतौ
काळ्मस
म्हैं मानग्यो
सांच कैवै है लोग
के जीवण है
सतरंगी इंद्ररधनुष.
***

तू आभौ
तू एक अकास हौ
मतळब आभौ
घणौ लंबौ चवडौ
अणूतौ फ़ैलाव लियोङौ
जठीनै देखां
बठीनै तू, फ़गत तू
म्हैं थनै देख-देख
करतौ अचूम्भौ
आज भी हुवै
घणौ इचरज
के इतरी बडी चीज नै
बणावण आळौ
आप कितरौ बडौ हुसी
कुण जाणै?
***


दोय गजलां
(एक)
सीधी सीधी बात करीजे ।
कदे न भीतरघात करीजे।
जिनगाणी भर आछी बात्यां
भाया आतमसात करीजे।
हिवड़ां बिचलौ मिटै आंतरौ,ऎड़ा तू हालात करीजे ।
हिन्दु-मुस्लिम कांई होवै,मिनखपणै री बात करीजे ।
सै मिनखां रो रगत सरीसौ
कदे जात ना पांत करीजे ।
पीड़ किणी री जद भी दीसै,आंख्यां सू बरसात करीजै ।
मिटै मांयली रात अंधारी,सबदां सूं प्रभात करीजे ।
हाथ जोड़ ईश्वर नै कैणौ,भलौ जगत रौ नाथ करीजै ।
***

(
दोय)
चार दिनां री जिन्गाणी है ।
बिना रुक्यां बैतो पाणी है ।
मन सूं बेमन सूं कींकर भी,आ गीता सबनै गाणी है ।
कोई आवै कोई जावै,दुनियां तो आणी-जाणी है ।
अबखायां सूं लड़ां एक हुय
आपस में जूझ्यां हांणी है ।
सोना चांदी हीरा मोती,आं में के आणी जाणी है।
धन है आज काल नीं रैवै,पुण्य कमाई रै जाणी है ।
आ काया माटी सूं लीन्ही,माटी नै ही संभलाणी है ।
***

1 टिप्पणी:

  1. संजय री कवितावां भरोसो दिरावै कै राजस्थानी कविता
    किणी दीठ सूं आखी भारतीय दूजी भासावां री कवितावां सूं कमतर नीं है.मुठ्ठी भर उजियाळो अर तू आभौ सांतरी कवितावां है

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