हरीश बी शर्मा री कवितावां



थमपंछीड़ा
अरे
थम पंछीड़ा
ढबज्या
देख
सूरज रो ताप बाळ देवैलो।
बेळू सूं ले सीख
कै उड बठै तांई
जित्ती है थारी जाण
जित्ती है थारी पिछाण
आमआदमी
जिको नीं जाणै
मांयली बातां
गांव री बेळू ने सोनो
अर पोखरां में चांदी बतावे।
सन् सैंताळिस रै बाद हुया
सुधार गिणावै
नूंवै सूरज री अडीक राखै
अर अंधारो ढोवै।
छापै में छपी खबरां
पढ़ै अर चमकै
बो आम आदमी है।
***

हिचकी
म्हारी जिनगाणी रे रोजनामचे में
थारी ओळूं
हिचकी बण'र उभरे
अर बिसरा देवै सै कीं
म्हारो आगो-पाछो
ऊंच-नीच
हां, सैं कीं
चावूं, नीं थमे हिचकी
भलां ही हिचकतो रूं सारी उमर
अर थारै नांव री हिचकी ने
देंवतो रूं दूजा-दूजा नांव
दाब्या राखूं म्हारो रोजनामचो
जाणूं हूं
थारै अर म्हारे बिचाळै री आ कड़ी
जे टूटगी तो फेर कांई रैवेला बाद-बाकी
इण साचने सोधण बाद
म्हें हूं म्हारे दुख-सुख रो जिम्मेवार
पण बता तो सरी
थूं कियां परोटे है म्हारे नांव री हिचकी
***

सिरजण पेटे
थारै खुरदारा शबदां ने
परोटतां अर
थारै दिखायोड़ै
दरसावां पर
नाड़ हिलांवता ई'जे
म्हारा जलमदिन निकळना हा
फैरुं क्यूं दीनी
म्हने रचण री ऊरमा
सामीं मूंढ़े म्हांसू बात नीं करण्या
थारै परपूठ एक ओळभो है
कीं तो म्हारे रचण अर सिरजण पेटे ई
'कोटो' रखतौ।
***

ओळख
जमीन अबेस म्हारी ही
जद बणावण री सोची एक टापरो
निरैंत पाणै री कल्पना में
करणी सोची कीं थपपणा
अपणापै री
एक भाव री जको उजास देवै
मन पंछी ने।
पण जमीन रो टुकड़ो
कई दे'र देवतो
ब्ल्यू प्रिंट खिचिजग्या
अर म्हारी कल्पना रा सैं धणियाप
अचकचा'र खिंडग्या
खड़ी हुवण लागी भींत्या
बणग्यो घर
एक ऊंची बिल्डिंग
जके में म्हारो धणियाप इत्तो ही हो
क म्हारै कारणै इणरी योजना बणी
राजी करण ने कइ लोग मिळ परा
बचावण ने फ्रस्टेशन सूं
नांव दियो म्हनै नींव रो भाटो
म्हारै जिसा घणखरा
इण बिल्डिंग हेठे
भचीड़ा खा-खा'र एक-दूजे सूं
धणियाप जतावंता आपरो
जाणन लाग्या हां
धीरे-धीरे आपरी ओळख
हुया संचळा
थरपिजग्या आप-आपरी ठौड़
पूरीजी म्हारी आस
निरैंत पाणै री कल्पना
***

खूंट
म्हारी खूंट री परली ठौड़ रो दरसाव
तिस ने बधावै
अर म्हारै पांति रे तावड़े ने
घणौ गैरो करे।
थारी छियां
म्हारी कळबळाट बधावण सारु
कम नीं पड़े।
थनै पाणै री बधती इंच्छा
देखतां-देखतां तड़प बण जावै
जिकै में रैवे थारै नांव रो ताप, ओ ताप
तोड़ देवै है कईं दफै हदां - थारी अर म्हारी खूंट बीचली
***

चाळणी
रोजीना थारै शबदां बिंध्योड़ी चालणी
म्हारे मन में बण जावै
थूं जाणनो चावै कम अर बतावणो चावै घणौ।
म्हारे करियोड़े कारज में
थूं खोट जोवै
अर कसरां बांचै
म्हे जाणूं हूं, पण चावूं
थूं थारी सरधा सारु इयां करतो रे
चायै म्हारे काळजे में चाळनियां बधती जावै
काल थारा कांकरा अर रेतो
ई चालणी सूं ई छानणो है
***

सुपारी
सरोते रे बीच फंसी सुपारी
बोले कटक
अर दो फाड़ हुय जावै
जित्ता कटक बोलै
बित्ता अंस बणावै
लोग केवै सुपारी काटी नीं जावै
तद ताणी
मजो नीं आवै-खावण रो
आखी सुपारी तो पूजण रे काम आवै
पूजायां बाद
कुंकु-मोळी सागै पधरा दी जावै
स्वाद समझणिया सरोता राखै
बोलावे कटक
अर थूक सागै, जीभ माथै
रपटावंता रेवै सुपारी ने
सुपारी बापड़ी या सुभागी
जे जूण में आई है-लकड़ां री
अर सुभाव है-स्वाद देवणों
तो ओळभो अर शबासी कैने
***

1 टिप्पणी:

  1. हरीश जी, क्या टिप्पणी लिखूँ आपकी लेखनी पर ! अंतर का ज्वार शब्दों के मोती के रूप में देदीप्यमान हो रहा है !

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